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  1. खण्ड 4 - एक और अनेक, मानव (भावनाप्रधान सामाजिक उपन्यास)

    खण्ड 4 - एक और अनेक, मानव (भावनाप्रधान सामाजिक उपन्यास)

    Rs300.00

    एक और अनेक, मानव (भावनाप्रधान सामाजिक उपन्यास) Learn More
  2. अनदेखे बंधन

    अनदेखे बंधन

    Rs100.00

     

    ‘अनदेखे बंधन’ जैसा कि नाम से ही विदित होता है, यह गुरुदत्तजी का एक सामाजिक उपन्यास है जिसमें उन्होंने ग्रामीण व शहरी विचारधाराओं का बड़ा ही अनोखा समन्वय प्रस्तुत किया है।

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  3. avtaran

    अवतरण

    Rs60.00


    एक बार हमारे मुहल्ले के एक मन्दिर में महाभारत की कथा रखायी गयी। यह वे दिन थे, जब आर्यसमाज और सनातनधर्म सभा में शास्त्रार्थों की धूम थी। मुहल्ले के कुछ सनातनधर्मी युवको में धर्म ने जोश मारा और वे हिन्दुओं की प्रसिद्ध धर्म-पुस्तक महाभारत की कथा कराने लगे।

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  4. Antim Yatra

    अन्तिम यात्रा

    Rs30.00

    इस पुस्तक के लेखक श्री वैद्य गुरुदत्त जम्मू-कश्मीर आन्दोलन में डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी के साथ दो बार जेल भेजे गए थे। पहली बार जब डॉ.साहब, श्री निर्मलचन्द्र चटर्जी (प्रधान, हिन्दू महासभा), श्री नन्दलाल जी शास्त्री (मंत्री रामराज्य परिषद्) तथा आठ अन्य व्यक्तियों के साथ 6 मार्च 1953 को पकड़े गए तो वैद्यजी भी उनके साथ थे। Learn More
  5. अपने पराये

    अपने पराये

    Rs65.00

    (1894 & 1989) शिक्षा : एम.एस.सी. प्रथम उपन्यास ‘स्वाधीनता के पथ पर’ से ही ख्याति की सीढ़ियों पर जो चढ़ने लगे कि फिर रुके नहीं। विज्ञान की पृष्ठभूमि पर वेद, उपनिषद्, दर्शन इत्यादि शास्त्रों का अध्ययन आरम्भ किया तो उनको ज्ञान का अथाह सागर देख उसी में रम गये। Learn More
  6. आवरण

    आवरण

    Rs110.00

    जैसे वस्त्र शरीर का आवरण है अथवा शरीर आत्मा का आवरण है, इसी प्रकार विचार तथा भावनाओं का आवरण भी होता है। वस्त्र की रक्षा करने में कोई भी व्यक्ति शरीर को हानि नहीं पहुँचाएगा, न ही शरीर के लिए कोई आत्मा का हनन करना चाहेगा। इसी प्रकार विचारों में आवरण गौण और भीतर का संरक्षित भाव मुख्य माना जाना चाहिए। कठिनाई वहाँ पड़ती है, जहाँ कोई आत्मा का अस्तित्व माने ही नहीं। ऐसे व्यक्ति के लिए शरीर ही सब कुछ होता है। अथवा कभी कोई शरीर को हेय और आवरण को मुख्य मानने लगे। इस अवस्था में आवरण उपयुक्त न होने पर मृत्यु तक हो सकती है। Learn More
  7. आशा निराशा

    आशा निराशा

    Rs40.00

    ‘‘माता जी ! पिताजी क्या काम करते हैं?’’ एक सात-आठ वर्ष का बालक अपनी मां से पूछ रहा था। मां जानती तो थी कि उसका पति क्या काम करता है, परन्तु हिन्दुस्तान की अवस्था का विचार कर वह अपने पुत्र को बताना नहीं चाहती थी कि उसका पिता उस सरकारी मशीन का एक पुर्जा है, जो देश को विदेशी हितों पर निछावर कर रही है। अतः उसने कह दिया, ‘‘मैं नहीं जानती। यह तुम उनसे ही पूछना।’’ Learn More
  8. अस्ताचल की ओर - भाग 1

    अस्ताचल की ओर - भाग 1

    Rs200.00

    पण्डित शिवकुमार को त्रिविष्टप की राजधानी में रहते हुए छत्तीस वर्ष व्यतीत हो चुके थे। वह अभी तक भी राजगुरु के पद पर आसीन था। यद्यपि जिस राजा ने उसको इस पद पर प्रतिष्ठित किया था उस राजा संजीवायन लामा का देहान्त हो चुका था। उसका देहान्त तो शिवकुमार के आने के दस वर्ष उपरान्त ही हो गया था। उस समय जो युवराज पद पर था वह इस समय राजा के पद पर आसीन हो राज्य कर रहा था। उसको राज्य करते हुए छब्बीस वर्ष हो गये थे। संजीवायन लामा ने तत्कालीन महामन्त्री त्रिभुवन थापा के पुत्र कीर्तिमान को युवराज पद पर प्रतिष्ठित किया था। वही इस समय त्रिविष्टप का राजा था। महामन्त्री त्रिभुवन का भी बहुत पहले देहान्त हो चुका था। Learn More
  9. अस्ताचल की ओर - भाग 2

    अस्ताचल की ओर - भाग 2

    Rs150.00

    हिमालय की सुरम्य घाटी में मार्तण्ड नामक बस्ती में मार्तण्ड भवन के कुछ अन्तर पर नदी के किनारे एक पक्की कुटिया है। कुटिया के बाहर चबूतरे पर मृगचर्म पर पालथी मारे पण्डित शिवकुमार विराजमान थे। सूर्योदय का समय था, पण्डित शिवकुमार सूर्याभिमुख ध्यानस्थ बैठे थे और उदीयमान सूर्य की किरणें उनकी मुख छवि को द्योतित कर रही थीं। Learn More
  10. अस्ताचल की ओर - भाग 3

    अस्ताचल की ओर - भाग 3

    Rs150.00

    श्री गुरुदत्त प्रथम उपन्यास ‘स्वाधीनता के पथ पर’ से ही ख्याति की सीढ़ियों पर जो चढ़ने लगे कि फिर रुके नहीं। विज्ञान की पृष्ठभूमि पर वेद, उपनिषद्, दर्शन इत्यादि शास्त्रों का अध्ययन आरम्भ किया तो उनको ज्ञान का अथाह सागर देख उसी में रम गये। Learn More

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