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स्व-अस्तित्व की रक्षा

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‘स्व-अस्तित्व की रक्षा’ स्व. श्री गुरुदत्त जी की उन पाण्डुलिपियों में से एक है जो अभी प्रकाश में नहीं आई हैं। पुस्तक में आरम्भ में ही बताया गया है कि इस संसार में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं- एक दैवी स्वभाव वाले और दूसरे आसुरी स्वभाव वाले।

हिन्दू सामाज के अस्तित्व अर्थात् उसकी विद्यमानता के स्थायित्व के विषय पर इस पुस्तक द्वारा लिखने का प्रयास किया जा रहा है।
सर्वप्रथम यही प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या वर्तमान में कोई हिन्दू समाज विद्यमान भी है जिसकी रक्षा के विषय में इन पृष्ठों पर लिखने का यत्न किया जा रहा है ?

यह घर राम का है। इस घर में राम रहता है। इस घर में कुछ लोग आये हुए हैं।
ये तीनों वाक्य समानार्थक नहीं हैं।
प्रथम वाक्य में घर के स्वामित्व के विषय में कहा गया है। दूसरे वाक्य में तो केवल यह कहा गया है कि उस में राम निवास है। उस घर में वह किस अधिकार से निवास करता है, यह स्पष्ट नहीं है। वह किरायेदार हो सकता है, वह घुसपैठिया भी हो सकता है जो अनाधिकृत रूप में वहाँ निवास करता हो। यह भी समझा जा सकता है कि वह थोड़े उस समय के लिए वहाँ आकर रहने लगा हो और अपना कार्य सिद्ध हो जाने पर वहाँ से चला जाएगा।

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Description

इस पुस्तक के प्रथम परिच्छेद में दैवी और आसुरी स्वभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है। श्रीमद्भागवद्गीता में कृष्ण का अर्जुन को जो उपदेश है उसकी इस परिच्छेद में विस्तार से व्याख्या की गई है। दैवी और आसुरी स्वभाव का वर्णन करने के उपरान्त दोनों की तुलना करके मनुष्य को दैवी स्वभाव का क्यों बनना चाहिए, इस तथ्य को प्रतिपादित करते हुए दैवी स्वभाव से क्या-क्या हानियाँ होती हैं तथा वर्तमान में जिन-जिन नेताओं का स्वभाव आसुरी रहा है, उन्होंने देश, जाति और धर्म को कितनी तथा क्या-क्या हानियाँ पहुँचाई हैं, इसका भी उल्लेख कर दिया है। प्रशंगवशात् यह भी उल्लेख कर दिया गया है कि जो परिवार दैवी स्वभाव का होता है उसके परिवार में संतति भी सामान्यता दैवी स्वभाव की ही उत्पन्न होती है। किंतु इसके अपवाद भी होते हैं। उसका कारण मनुष्य के पूर्वजन्म के कर्म तथा वर्तमान जन्म का परिवारेतर वातावरण मुख्य होता है। लेखक का कथन है कि पूर्वजन्म के कर्म के विषय में तो विवशता किंतु वर्तमान परिवेश को सुधारना व्यक्ति के स्वयं के वश में है। बस आवश्यकता है उसको दैवी स्वभाव के गुणों को समझने की। परिच्छेद के अन्त में यही कामना की गई है कि मनुष्य यथा-शक्ति दैवी स्वभाव का बने तथा अन्यों को भी इसके लिए प्रेरित करे।

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